Friday, December 7, 2012

मारवाड़ की ऐति‍हासि‍क कथा


पन्ना धाय से कम न था रानी बाघेली का बलिदान                               http://www.gyandarpan.com/2011/02/blog-post_24.html




          


        कहानी -  रतन सिंह शेखावत                                                                      स्‍वर - संज्ञा टंडन

                                            


भारतीय इतिहास में खासकर राजस्थान के इतिहास में बलिदानों की गौरव गाथाओं की एक लम्बी श्रंखला है इन्ही गाथाओं में आपने मेवाड़ राज्य की स्वामिभक्त पन्ना धाय का नाम तो जरुर सुना होगा जिसने अपने दूध पिते पुत्र का बलिदान देकर चितौड़ के राजकुमार को हत्या होने से बचा लिया था | ठीक इसी तरह राजस्थान के मारवाड़ (जोधपुर) राज्य के नवजात राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब से बचाने के लिए मारवाड़ राज्य के बलुन्दा ठिकाने की रानी बाघेली ने अपनी नवजात दूध पीती राजकुमारी का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह के जीवन की रक्षा की व राजकुमार अजीतसिंह का औरंगजेब के आतंक के बावजूद लालन पालन किया, पर पन्नाधाय के विपरीत रानी बाघेली के इस बलिदान को इतिहासकारों ने अपनी कृतियों में जगह तो दी है पर रानी बाघेली के त्याग और बलिदान व जोधपुर राज्य के उतराधिकारी की रक्षा करने का वो एतिहासिक और साहित्यक सम्मान नहीं मिला जिस तरह पन्ना धाय को | रानी बाघेली पर लिखने के मामले में इतिहासकारों ने कंजूसी बरती है और यही कारण है कि रानी के इस अदम्य त्याग और बलिदान से देश का आमजन अनभिज्ञ है |

28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद नामक सैनिक ठिकाने पर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया था उनके निधन के समय उनके साथ रह रही दो रानियाँ गर्भवती थी इसलिए वीर शिरोमणि दुर्गादास सहित जोधपुर राज्य के अन्य सरदारों ने इन रानियों को महाराजा के पार्थिव शरीर के साथ सती होने से रोक लिया | और इन गर्भवती रानियों को सैनिक चौकी से लाहौर ले आया गया जहाँ इन दोनों रानियों ने 19 फरवरी 1679 को एक एक पुत्र को जन्म दिया,बड़े राजकुमार नाम अजीतसिंह व छोटे का दलथंभन रखा गया | इन दोनों नवजात राजकुमारों व रानियों को लेकर जोधपुर के सरदार अपने दलबल के साथ अप्रेल 1679 में लाहौर से दिल्ली पहुंचे | तब तक औरंगजेब ने कूटनीति से पूरे मारवाड़ राज्य पर कब्ज़ा कर लिया और जगह जगह मुग़ल चौकियां स्थापित कर दी और राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर राज्य के उतराधिकारी के तौर पर मान्यता देने में आनाकानी करने लगा |
तब जोधपुर के सरदार दुर्गादास राठौड़,बलुन्दा के ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास आदि ने औरंगजेब के षड्यंत्र को भांप लिया उन्होंने शिशु राजकुमार को जल्द जल्द से दिल्ली से बाहर निकलकर मारवाड़ पहुँचाने का निर्णय लिया पर औरंगजेब ने उनके चारों और कड़े पहरे बिठा रखे थे ऐसी परिस्थितियों में शिशु राजकुमार को दिल्ली से बाहर निकलना बहुत दुरूह कार्य था | उसी समय बलुन्दा के मोहकमसिंह की रानी बाघेली भी अपनी नवजात शिशु राजकुमारी के साथ दिल्ली में मौजूद थी वह एक छोटे सैनिक दल से हरिद्वार की यात्रा से आते समय दिल्ली में ठहरी हुई थी | उसने राजकुमार अजीतसिंह को बचाने के लिए राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदल लिया और राजकुमार को राजकुमारी के कपड़ों में छिपाकर खिंची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से निकालकर बलुन्दा ले आई | यह कार्य इतने गोपनीय तरीके से किया गया कि रानी ,दुर्गादास,ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास,कु.हरिसिघ के अलावा किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगी यही नहीं रानी ने अपनी दासियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी कि राजकुमारी के वेशभूषा में जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह का लालन पालन हो रहा है |
छ:माह तक रानी राजकुमार को खुद ही अपना दूध पिलाती,नहलाती व कपडे पहनाती ताकि किसी को पता न चले पर एक दिन राजकुमार को कपड़े पहनाते एक दासी ने देख लिया और उसने यह बात दूसरी रानियों को बता दी,अत: अब बलुन्दा का किला राजकुमार की सुरक्षा के लिए उचित न जानकार रानी बाघेली ने मायके जाने का बहाना कर खिंची मुक्न्दास व कु.हरिसिंह की सहायता से राजकुमार को लेकर सिरोही के कालिंद्री गाँव में अपने एक परिचित व निष्टावान जयदेव नामक पुष्करणा ब्रह्मण के घर ले आई व राजकुमार को लालन-पालन के लिए उसे सौंपा जहाँ उसकी (जयदेव)की पत्नी ने अपना दूध पिलाकर जोधपुर के उतराधिकारी राजकुमार को बड़ा किया |
यही राजकुमार अजीतसिंह बड़े होकर जोधपुर का महाराजा बने|इस तरह रानी बाघेली द्वारा अपनी कोख सूनी कर राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदलकर जोधपुर राज्य के उतराधिकारी को सुरक्षित बचा कर जोधपुर राज्य में वही भूमिका अदा की जो पन्ना धाय ने मेवाड़ राज्य के उतराधिकारी उदयसिंह को बचाने में की थी | हम कल्पना कर सकते है कि बलुन्दा ठिकाने की वह रानी बाघेली उस वक्त की नजाकत को देख अपनी पुत्री का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब के चुंगल से बचाकर मारवाड़ नहीं पहुंचाती तो मारवाड़ का आज इतिहास क्या होता? नमन है भारतभूमि की इस वीरांगना रानी बाघेली जी और इनके इस अद्भुत त्याग व बलिदान को; 

2/24/2011 को  Ratan singh shekhawat की पोस्‍ट पर आधारि‍त  सीजीरेडि‍यो की प्रस्‍तुति
http://www.gyandarpan.com/2011/02/blog-post_24.html

11 comments:

संध्या शर्मा said...

नमन है भारतभूमि की इस वीरांगना रानी बाघेली जी और उनके त्याग व बलिदान को; सच है पन्ना धाय रानी के बारे में हम अच्छी तरह जानते हैं लेकिन रानी बाघेली इस त्याग और बलिदान से अब तक अनजान थे. इसे हम तक पहुँचाने के लिए रतन सिंह शेखावत जी की लेखनी और संज्ञा जी के स्वर का बहुत-बहुत आभार...

संगीता पुरी said...

बहुत कुछ छुपा रहा पुराने इतिहासकारों से..
अभी तक बहुत कुछ छुपा हुआ है आज के हजारों पत्रकारों से ..
रतन सिंह शेखावत जी की लेखनी और संज्ञा जी के स्वर दोनो के द्वारा सुंदर प्रस्‍तुतिकरण ..
शुभकामनाएं !!

Ratan singh shekhawat said...

वाह ! अपनी लिखी कहानी रेडियो पर सुनकर बहुत अच्छा लगा :)
कहानी को बढ़िया स्वर देने के लिए संज्ञा जी का बहुत बहुत आभार|

AK Rajput said...

लाजवाब प्रस्‍तुतिकरण, संज्ञा जी की आवाज ने चार चाँद लगा दिये ।

Rewat said...

Well done Hukum!

Ranveer Singh Shekhawat said...

शानदार...

Raghvandra said...

balunda thikane ki ithihas se iss adbhut prasang ko logo tak phoochane ke liye shri ratan singhji ko Naman...or ussko sundar dhang se suar dene ke liye su-shri shandya tandanji ka teh dil se aabhar....!!

Raghvendra Pratap Singh Rathore/Thikana -Balunda (Marwar)

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

इन्ही बलिदानों ने देश का मान रखा है, अच्छी प्रस्तुति

Rajput said...

लाजवाब! संज्ञा जी आवाज ने इस बलिदानी गाथा मे चार चंद लगा दिये। पृष्ठभूमि मे बजाया गया हल्का संगीत अतीत को वर्तमान मे अवतरित करने सा आभास देता हैं

sanjaysahu potiyakala said...

ऐसे ही बलिदानिर्यों ने हमेआज सुंदर भविष्य दिया है अच्छी प्रस्तुति बधाई संध्या जी

Vimla Sharma said...

यह अध्याय तो जोधपुर के भी कम ही लोग जानते है,सोजतीगेट के भीतर एक बावड़ी को गोरिन्दा नाम से कहते हे,इस लुप्त अध्याय को प्रकाशित करने के लिये अनेकों धन्यवाद।

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